रायगढ़।
तमनार अंचल की हवा इन दिनों सिर्फ गर्म नहीं है, बल्कि भीतर ही भीतर एक गहरी बेचैनी भी समेटे हुए है। पेलमा क्षेत्र में प्रस्तावित ओपन कास्ट कोयला खदान परियोजना ने एक बार फिर उस पुराने लेकिन अनुत्तरित सवाल को सामने ला खड़ा किया है—क्या विकास की रफ्तार गांवों और जंगलों की कीमत पर ही तय होगी?
एसईसीएल की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का दायरा जितना बड़ा बताया जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा इसका असर व्यापक होने वाला है। करीब 2000 हेक्टेयर में फैली योजना के तहत 362 हेक्टेयर वन भूमि के प्रभावित होने और 14 गांवों के अस्तित्व पर संकट के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। आंकड़ों में यह सिर्फ जमीन का अधिग्रहण है, लेकिन जमीन से जुड़े लोगों के लिए यह उनकी पहचान, परंपरा और जीवन के ताने-बाने का सवाल है।
भरोसे का संकट: पिछली कहानियां अभी भी जिंदा हैं
इस क्षेत्र के लोग विकास विरोधी नहीं हैं—वे सिर्फ अपने अनुभवों से सतर्क हैं। तमनार और आसपास बीते वर्षों में आए उद्योगों और खदानों ने रोजगार और विकास के वादे जरूर किए, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही रही। अधूरा पुनर्वास, प्रदूषण की मार और रोजगार के सीमित अवसरों ने लोगों के मन में अविश्वास की एक स्थायी परत बना दी है।
ग्रामीणों का सीधा कहना है—“पहले जो मिला नहीं, उस पर अब कैसे भरोसा करें?”
यही वजह है कि पेलमा परियोजना अब केवल एक नई शुरुआत नहीं, बल्कि पुराने घावों की याद भी बन चुकी है।
पर्यावरण की कीमत पर प्रगति?
विशेषज्ञों की चिंता भी कम गंभीर नहीं है। बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र की कटाई का मतलब सिर्फ पेड़ों का नुकसान नहीं होता—यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। जल स्रोतों के सूखने, भूजल स्तर गिरने और वायु गुणवत्ता बिगड़ने की आशंकाएं पहले से ही जताई जा रही हैं।
रायगढ़ जिला पहले ही औद्योगिक दबाव झेल रहा है, ऐसे में एक और बड़ी खदान पर्यावरणीय संतुलन को और नाजुक बना सकती है।
19 मई: सिर्फ जनसुनवाई नहीं, निर्णायक मोड़
अटल चौक, पेलमा में प्रस्तावित 19 मई की जनसुनवाई अब इस पूरे विवाद का केंद्र बन गई है। प्रशासन, कंपनी और स्थानीय समुदाय—तीनों अपने-अपने तर्क और तैयारी के साथ मैदान में हैं।
लेकिन हाल के महीनों में जिस तरह ग्रामीणों ने अन्य परियोजनाओं के खिलाफ मुखर विरोध दर्ज कराया है, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि यह जनसुनवाई औपचारिकता भर नहीं रहने वाली।
गांवों में लगातार बैठकें हो रही हैं, लोग अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं और अब मुद्दा सिर्फ मुआवजे या नौकरी तक सीमित नहीं रहा। यह लड़ाई अब अस्तित्व, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की बन चुकी है।
सवाल अब भी वही है…
पेलमा की परियोजना ने एक बार फिर विकास के मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या विकास का मतलब केवल संसाधनों का दोहन है, या उसमें उन लोगों की भागीदारी और सहमति भी जरूरी है, जो सदियों से उन संसाधनों के संरक्षक रहे हैं?
19 मई की जनसुनवाई भले अंतिम फैसला न हो, लेकिन यह जरूर तय करेगी कि आगे की राह संवाद से निकलेगी या संघर्ष से।
फिलहाल तमनार की जमीन पर सिर्फ खदान की योजना नहीं, बल्कि एक बड़े टकराव की आहट साफ सुनाई दे रही है।
